Wednesday, 5 April 2023

उन की महक ने दिल के ग़ुंचे खिला दिये हैं



उन की महक ने दिल के ग़ुंचे खिला दिये हैं
जिस राह चल गए हैं कूचे बसा दिये हैं

जब आ गई हैं जोश-ए-रहमत पे उन की आँखें
जलते बुझा दिये हैं, रोते हँसा दिये हैं

एक दिल हमारा क्या है, आज़ार इस का कितना
तुम ने तो चलते फिरते मुर्दे जिला दिये हैं

उन के निसार कोई कैसे ही रंज में हो
जब याद आ गए हैं, सब ग़म भुला दिये हैं

हम से फ़क़ीर भी अब फेरी को उठते होंगे
अब तो ग़नी के दर पर बिस्तर जमा दिये हैं

असरा में गुज़रे जिस दम बेड़े पे क़ुदसियों के
होने लगी सलामी, परचम झुका दिये हैं

आने दो या डुबो दो अब तो तुम्हारी जानिब
कश्ती तुम्हीं पे छोड़ी लंगर उठा दिये हैं

दूल्हा से इतना कह दो, प्यारे !
सुवारी रोको मुश्किल में हैं बराती, पुर-ख़ार बादिये हैं

अल्लाह क्या जहन्नम अब भी न सर्द होगा
रो रो के मुस्तफ़ा ने दरिया बहा दिये हैं

मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने माँगा
दरिया बहा दिये हैं, दुर्र-बे-बहा दिये हैं

मुल्क-ए-सुख़न की शाही तुम को, रज़ा
मुसल्लम जिस सम्त आ गए हो सिक्के बिठा दिये हैं
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ان کی مہک نے دل کے غنچے کھلا دیے ہیں
جس راہ چل دئے ہیں کوچے بسادئیے ہیں


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